कबीर भजन प्रेम प्रीत की रीतप्रेम प्रीत की रीत दुहेली,जो जाने सो जाने जी।सिर देवे सो प्याला लेवैमुर्ख क्या पहचाने जीकायर का ये काम नहीं हैवो मुर्ख ना माने जीतन मन धन सर्वस कर सौंपे,साहिब हाथ बीकाने जीनित्यानंद मिले स्वामी गुमानी,लग गई चोट निशाने जी
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें