गुरुवार, 22 जुलाई 2021

हम उन संतां के दास - कबीर दास जी का भजन निर्गुणी

जिंदगी के उद्देश्य पर कबीर जी के दोहे

Kabir ke Shabd

हम उन संतां के दास, जिन्होंने मन मार लिया।।
आपा मार जगत में बैठे, नहीं किसी से काम।
उनमें तो कुछ अंतर नाही, सन्त कहो चाहे राम।।

मन मारा तन वश किया जी,हुए भर्म भय दूर।
बाहर तो कुछ दिखै नाही, अंदर झलकै नूर।।

प्याला पिया सत्तनाम का, दिया छोड़ जगत का मोह।
हमने सद्गुरु पूरे मिलगे, सहज मुक्ति गई होए।।

नरसी जी के सद्गुरु स्वामी, दिया अमिरस प्याय।
एक बूंद सागर में मिलगी, क्या कर ले यमराय।।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें