Kabir ke Shabdमन ना रंगाए, रंगाए जोगी कपड़ो।काम क्रोध ने डेरा डाला,मांग मांग के खाया टुकडोघर घर जा कर अलख जगाया,गलियन का भुसाया कुतड़ा।बनखंड जाकर धुना लायादिल ना जलाया, जलाया गठरा।।आजकल के नए नए साधु,जोहड़ पे जाके खिंडाया फफड़ा।कह कबीर सुनो भई साधो,सत्तनाम का ना लाया रगड़ा।।
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