Kabir ke Shabd
मानत नहीं मन मोरा रे साधो।
बार बार मे कह समझाऊँ, जग में जीवन थोड़ा रे।।
या काया को गर्भ न कीजे, क्या सांवल क्या गोरा रे।
बिन भक्ति तन काम न आवै,
कोट सुगन्ध चवोरा रे।।
या माया जन देख रे भूल्यो, क्या हाथी क्या घोड़ा रे।
जोड़ जोड़ धन बहुत बिगूचे,
लाखन कोट करोड़ा रे।।
दुविधा दुर्मत और चतुराई जन्म गयो नर बौरा रे।।
अज हूँ आन मिलो सत्त संगत,
सद्गुरु नाम निहोरा रे।।
लेतउठाय पड़तभुइँ गिर गिर, ज्यों बालक बिन कोरा रे।
कह कबीर चरण चित्त राखो,
ज्यूँ सुईं विच डोरा रे।

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