Kabir ke Shabd
हो तेरे कोन्या वश का रोग, कोय काटैगा काटनिया।।
बार बार क्या देखै नाड़ी, चोट लगी ना भीतरी जाड़ी।
यो नदी नाव संयोग, चल डाटेगा डाटनीया।।
मीरा कै के काला लड़ग्या, नस नस काया कतई जकड़ग्या।
सै सत्त कर्मों का यो भोग, दुख बांटेगा बाँटनिया।।
मरहम काट पिछाणै घाव नै, दुनिया अपने देखै दाव नै।
सब हंसी करेंगें लोग, गुण अवगुण के छांटनिया।।

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