कबीर भजन
मेरे मन मूर्खा भाई
मेरे मन मूर्खा भाई,गुरु बिन जागा कोण सी घाटी।
आगम से पाछम चल आया,बंक नाल की घाटी
इस काया में दस दरवाजे,पंक लगे ना टाटी।
घाटी है दूर पहुचना मुश्किल,आगे विषम कराटी
रपट पड़े तो ठौड़ ना पावे,जग में होजा हांसी।
हिन्दू मुसलमान बन दिए,बीच भर्म की टाटी
सांस यमों ने छीन लई तेरी पड़ी रह गई माटी।
सौदा करे तो यहाँ ही करले,आगे भीचवां घाटी
बैल बने कंगाल का तेरे ऊपर बाजें लाठी।
कह कबीर सुनो भाई साधो,ये सुनने की बाती
यम राजा की फ़ौज खड़ी है,त्रिवेणी के घाटी।

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