कबीर दास
गुरु थारे बिना, बिगड़ी ने कोन सवारें।
गुरु थारे बिना,बिगड़ी ने कोन सवारें।
एक दिन बिगड़ी पिता पुत्र में,बाँध खम्ब के मारे।
अपने भक्त की सहाय कर्ण ने, नरसिंह देही धारे।।
एक दिन बिगड़ी राजसभा में,द्रोपदी नाम पुकारे।
वा के चीर अनंत बढ़ाए, दुष्ट दुशाशन हारे।।
एक दिन बिगड़ी जन नरसी की,समधी जी के द्वारे।
आए सांवरिया भात भरा, भक्तां के कारज सारे।।
ज्यों-२भीड़ पड़ी भक्तन पे त्यों-२ आप पधारे।
घीसा सन्त करो गुरु कृपा, जीता दास पुकारे।।

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