Kabir ke Shabdकाया नगरी में हंसा बोलता।।आप ही बाग और आप हैं माली,आप ही फूल तोड़ता।।आप ही डांडी आपै पलड़ा,आप ही माल तोलता।।आप गरजे आप ही बरसे,आप ही हवा में डोलता।।कह रविदास सुनो भई साधो,पूरे को क्या तोलता।।
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