Kabir ke Shabd
उस घर की मनै खोल बता दो, कौन था देव पुजारा जी।
धरती भी नहीं थी अम्बर भी नहीं था, नहीं था सकल पसारा जी।
चन्दा भी नहीं था सूरज भी नहीं था, नहीं था नोलख तारा जी।।
अल्लाह भी नहीं था, खुदा भी नहीं था, नहीं था मुल्ला और काजी जी।
वेद भी नहीं था, गीता भी नहीं थीं, नहीं था बाँचनहारा जी।।
गुरू भी नहीं था, चेला भी नहीं था, नहीं था ज्ञानी और ध्यानी जी।
नाद भी नहीं था, बिंदु भी नहीं था, नहीं थी साखी शब्द वाणी जी।।
ब्रह्मा भी नहीं था विष्णु भी नहीं थी, नहीं था शंकर देवा जी।
कह कबीर सुनो भई साधो, सत्त था देव पुजारा जी।।

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