सोमवार, 12 जनवरी 2026

धूलैंडी / छारेड़ी (धूलिका पर्व) – महत्व, परंपरा और इतिहास

धूलैंडी / छारेड़ी (धूलिका पर्व)

धूलैंडी या छारेड़ी (धूलिका पर्व)

धूलैंडी, जिसे छारेड़ी या धूलिका पर्व भी कहा जाता है, होली के अगले दिन चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि को मनाई जाती है। यह पर्व होली के उत्सव का आध्यात्मिक और सामाजिक स्वरूप प्रस्तुत करता है।

इस दिन होली की अग्नि में शेष बची हुई पवित्र राख का विशेष महत्व होता है। वैदिक मंत्रों से अभिमंत्रित इस राख की श्रद्धापूर्वक पूजा की जाती है। कई स्थानों पर लोग इस पावन राख को मस्तक पर लगाकर एक-दूसरे से प्रेमपूर्वक मिलते हैं।

धूलैंडी की यह परंपरा अहंकार के त्याग और बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक मानी जाती है। यह पर्व हमें पुराने मतभेद भुलाकर नए रिश्तों और नई शुरुआत का संदेश देता है।

दिन के दूसरे पहर में धूलैंडी का उल्लासपूर्ण रूप देखने को मिलता है। लोग रंग, गुलाल, अबीर, कुमकुम और केसर से एक-दूसरे को रंगते हैं। यह रंगोत्सव आपसी प्रेम, भाईचारे और सामाजिक समरसता को मजबूत करता है।

धूलैंडी केवल रंगों का पर्व नहीं है, बल्कि यह मन की नकारात्मकता को दूर कर जीवन में सकारात्मक ऊर्जा भरने का त्योहार है। यह हमें प्रेम, सद्भाव और सौहार्द के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।


📌 निष्कर्ष:
धूलैंडी / छारेड़ी भारतीय संस्कृति का एक पवित्र और आनंदमय पर्व है, जो समाज में प्रेम, एकता और भाईचारे को मजबूत करता है।

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